Bollywood और देशभक्ति का रहा है पुराना नाता
- दीपक झा
सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के मानस को गढ़ने और राष्ट्रीय चेतना को प्रज्वलित करने का एक अत्यंत सशक्त दर्पण रहा है। जब-जब देश पर कोई संकट आया या राष्ट्रप्रेम की अलख जगाने की आवश्यकता महसूस हुई, भारतीय रुपहले परदे ने जनता के दिलों में देशभक्ति का ऐसा उफान पैदा किया, जिसने इतिहास के पन्नों को स्वर्णिम बना दिया। यह यात्रा केवल गानों या चंद संवादों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने अलग-अलग दौर में भारतीय जनमानस को एकजुट करने और राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराने में युगधात्री भूमिका निभाई है।
1947 में मिली आजादी के बाद भारतीय सिनेमा ने अपने अमर सेनानियों के बलिदानों को नमन करना शुरू किया। 1948 की फिल्म ‘शहीद’ में दिलीप कुमार ने युवाओं में राष्ट्रप्रेम का जज्बा भरा, तो वहीं 1965 की मनोज कुमार अभिनीत फिल्म ‘शहीद’ ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के पावन बलिदान को देश के घर-घर तक पहुंचा दिया। मनोज कुमार, जिन्हें भारतीय सिनेमा में प्यार से ‘भारत कुमार’ कहा जाने लगा, उन्होंने ‘पूरब और पश्चिम’, ‘क्रांति’ और ‘उपकार’ जैसी कालजयी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को भारतीय जनमानस की रग-रग में बसा दिया। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ जैसे तरानों ने किसान, जवान और राष्ट्र-निर्माण के संकल्प को एक पावन सूत्र में पिरो दिया।
समय बीतने के साथ देशभक्ति की परिभाषा में नए आयाम जुड़े और 1997 में आई जे.पी. दत्ता की ऐतिहासिक फिल्म ‘बॉर्डर’ ने इस शैली को एक अभूतपूर्व ऊंचाई प्रदान की। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की लोंगेवाला लड़ाई पर आधारित फिल्म ‘बॉर्डर’ ने सीमा पर तैनात जवानों के अदम्य साहस, उनके पारिवारिक त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण का ऐसा सजीव चित्र खींचा, जिसने पूरे देश की आंखों को नम कर दिया। ‘संदेशे आते हैं…’ जैसे भावुक गीत और ‘पहली गोली मैं नहीं चलाऊंगा, लेकिन उसके बाद…’ जैसे दमदार संवादों ने हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर दिए। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में देशभक्ति का ऐसा ज्वार ला दिया, जिसने हर नागरिक को देश के रक्षकों के प्रति नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया। ‘बॉर्डर’ केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह भारत के शौर्य का एक ऐसा राष्ट्रीय दस्तावेज बन गई, जिसकी गूंज आज दशकों बाद भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की मशाल जला देती है।
इसके बाद 2000 के दशक में ‘लगान’, ‘स्वदेश’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘दंगल’ जैसी फिल्मों ने दिखाया कि देशभक्ति केवल युद्ध के मैदान में बंदूक उठाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी मिट्टी से जुड़ने, सामाजिक कुरीतियों से लड़ने, देश के विकास में योगदान देने और वैश्विक मंच पर भारत का नाम रोशन करने में भी बसी है।
21वीं सदी के बदलते दौर में देशभक्ति के सिनेमा को एक नया क्षितिज मिला ‘धुरंधर’ जैसी युगांतरकारी फिल्मों से, जो न केवल बॉक्स आॅफिस का एक नया इतिहास बन गईं, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में राष्ट्रप्रेम की एक नई परिभाषा के रूप में दर्ज हो गईं। फिल्म ‘धुरंधर’ ने भारत के राष्ट्रीय स्वाभिमान, अभेद्य सुरक्षा चक्र, खुफिया रणनीतियों और देश के गुमनाम नायकों के शौर्य को जिस सिनेमाई विशालता और यथार्थवाद के साथ पर्दे पर उतारा, उसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। यह फिल्म केवल मनोरंजन या भव्य एक्शन का माध्यम नहीं थी, बल्कि इसने हर भारतीय को यह विश्वास दिलाया कि नया भारत अपने राष्ट्र और अपने नागरिकों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। इस फिल्म ने तकनीक, देशभक्ति और भावना का ऐसा अद्वितीय संतुलन साधा कि जब-जब स्क्रीन पर भारत के वीरों का पराक्रम दिखता, तब-तब सिनेमाघर तालियों और भारत माता के जयकारों से गूंज उठते। इसने यह सिद्ध कर दिया कि आज का भारतीय दर्शक अपनी जड़ों, अपनी सेना और अपने देश के गौरवशाली पक्ष को देखने के लिए कितना आतुर है। ‘धुरंधर’ ने न केवल कमाई के सारे कीर्तिमान ध्वस्त किए, बल्कि देश के युवाओं (जेन-जी) के भीतर राष्ट्र के प्रति गर्व और कर्तव्यबोध की एक नई लहर पैदा कर दी। इसी श्रृंखला में ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘शेरशाह’, ‘राजी’, ‘तान्हाजी’ और ‘आरआरआर’ जैसी फिल्मों ने भी भारतीय सेना के शौर्य और इतिहास के अमर नायकों की गाथाओं को पूरी जीवंतता के साथ देश के सामने रखा।
बहरहाल, रुपहले परदे का अब तक का सफर जितना शानदार रहा है, भविष्य के सिनेमा से देश की अपेक्षाएं उतनी ही गहरी हैं। आज जब भारत विश्वपटल पर एक नई आर्थिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में तेजी से उभर रहा है, तब भारतीय सिनेमा से यह उम्मीद की जाती है कि वह केवल सतही नारों और उग्रता तक सीमित न रहे। सिनेमा को इतिहास के पन्नों में खो चुके उन असंख्य अनाम स्वतंत्रता सेनानियों और गुमनाम नायकों की सच्ची गाथाओं को दुनिया के सामने लाना चाहिए, जिन्होंने बिना किसी प्रचार के देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इसके अलावा, भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों, इसरो की सफलताओं, खेल जगत के संघर्षों और जमीनी स्तर पर सामाजिक बदलाव लाने वाली प्रेरक कहानियों को पूरी ईमानदारी और वैश्विक स्तर की तकनीक के साथ पेश किया जाना चाहिए।
सिनेमा का मुख्य दायित्व आज के युवाओं में केवल क्षणिक आक्रोश पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अनुशासन, नागरिक कर्तव्यों के पालन और राष्ट्र-निर्माण के दीर्घकालिक कार्यों में योगदान देने के लिए प्रेरित करना है। मूक फिल्मों की गुप्त गूंज से लेकर आज के धुरंधर सिनेमा की गड़गड़ाहट तक, रुपहला परदा हमेशा से भारत की आत्मा का संवाहक रहा है। जब-जब स्क्रीन पर भारत माता की जय का उद्घोष होता है और पृष्ठभूमि में राष्ट्रभक्ति का संगीत बजता है, तब-तब 140 करोड़ दिलों की धड़कनें एक साथ जुड़कर यह संदेश देती हैं कि सिनेमा और राष्ट्रप्रेम का यह अटूट रिश्ता आने वाले युगों-युगों तक भारत की चेतना को यूं ही आलोकित करता रहेगा।
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