आत्मजागरण का विज्ञान है तंत्र

  • सद्गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली

तंत्र का अभिप्राय है-एक विस्फोटात्मक ऊर्जा का प्रादुर्भाव, जिससे सूक्ष्म शरीर में स्थित सुप्त प्राण-शक्ति का ऊर्ध्वगामी विकास तेजी से हो सके, ताकि तीव्र शक्ति क्रिया का जागरण हो सके।  मनुष्य का शरीर एक यंत्र है और इसको आत्मा रूप तंत्र के माध्यम से स्पन्दित कर तीव्रता प्रदान की जाती है। सामान्य शब्दों में मनुष्य के शरीर में ऊर्जा के अनगिनत केन्द्र निरंतर कार्य कर रहे हैं। प्रत्येक विचार, प्रत्येक भावना, प्रत्येक संकल्प, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म सूक्ष्म ऊर्जाओं से संचालित होता है। जब ऊर्जा बिखरी हुई होती हैं, सामान्य स्वरूप में प्रवाह करती है, परन्तु जब तंत्र के माध्यम से संगठित होकर प्रवाह करती है तब मनुष्य के जीवन में असाधारण उपलब्धियों का आधार बन जाती है।

तंत्र का संसार अत्यंत विशाल, गहन और बहुआयामी है। सामान्य जनमानस में ‘तंत्र’ शब्द के प्रति एक रहस्य, भय या संकोच का भाव पाया जाता है, परन्तु यदि इसके वास्तविक स्वरूप को समझा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि तंत्र अपने प्राकृतिक स्वरूप में किसी भी प्रकार से नकारात्मक या भयावह नहीं है। ‘तंत्र’ शब्द का मूल अर्थ है – व्यवस्था, प्रणाली, वह विधि जिसके माध्यम से कोई क्रिया अपने निश्चित परिणाम तक पहुंचती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो तंत्र केवल साधना का मार्ग नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन को सुव्यवस्थित करने का विज्ञान है। जब हम किसी कार्य को एक निश्चित विधि, अनुशासन और क्रम के साथ करते हैं, तो वह कार्य अपने श्रेष्ठ परिणाम तक पहुंचता है यही तंत्र का प्राकृतिक और शुद्ध स्वरूप है।
‘तनोति विस्तारयति इति तंत्रम्’ जो जीवन और चेतना का विस्तार करे, वही तंत्र है। यह विस्तार केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। तंत्र व्यक्ति को उसकी सीमाओं से निकालकर उसकी वास्तविक क्षमता से परिचित कराता है। इसीलिए तंत्र को ‘शक्ति’ भी कहा जाता है। ‘शक्ति’ का स्वरूप अबोध होता है, साधक अपने विवेक, चेतना के आधार पर इस अबोध शक्ति को जिस कार्य हेतु बोध करता है शक्ति उसी दिशा में तीव्रता के साथ आगे बढ़ती है। तंत्र शक्ति उत्पन्न करता है और उस शक्ति को एक व्यवस्था के द्वारा उद्देश्य प्रदान किया जाता है, यह उद्देश्य ही परिणाम के रूप में प्राप्त होता है।

शक्ति: तंत्र की आत्मा
यदि तंत्र शरीर है, तो शक्ति उसकी आत्मा है। बिना शक्ति के तंत्र केवल एक निष्क्रिय ढांचा बनकर रह जाता है। भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की आत्मा माना गया है। यह वही शक्ति है जो सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार करती है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
दैवीय शक्ति प्रत्येक प्राणी में विद्यमान हैं। शक्ति केवल देवी का बाह्य स्वरूप ही नहीं बल्कि भीतर स्थित चेतना भी है। जब यही शक्ति तंत्र के माध्यम से व्यवस्थित होती है, तब जीवन में संतुलन, सफलता और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। शक्ति और तंत्र का सम्बन्ध उसी प्रकार है, जैसे ऊर्जा और मशीन का, मशीन तभी कार्य करती है जब उसमें ऊर्जा प्रवाहित होती है। इसी प्रकार तंत्र तभी फलित होता है जब उसमें शक्ति का संचार हो।

तंत्र का दुरुपयोग और भ्रांतियां
आज के समय में तंत्र को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। इसका मुख्य कारण है ‘अज्ञान’ और कुछ लोगों द्वारा इसका दुरुपयोग। तंत्र स्वयं में न तो अच्छा है और न बुरा; यह केवल एक साधन है। उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है, यही उसे अच्छा या बुरा बनाता है। अग्नि ज्वलनशील है, अग्नि भोजन पकाने में सहायक है, धातुओं का आकर देने में, अनेक औद्योगिक क्रियाओं में सहायक है। परन्तु वही अग्नि विनाश भी कर सकती है। इसी प्रकार तंत्र भी एक शक्ति है, जिसका सही उपयोग व्यक्ति को उन्नति की ओर ले जाता है और गलत उपयोग उसे पतन की ओर।

शक्ति साधना: तंत्र का आंतरिक मार्ग
शक्ति साधना तंत्र का वह आयाम है, जो व्यक्ति को उसके आंतरिक स्वरूप से जोड़ता है। तंत्र मन, प्राण और चेतना की गहराई में प्रवेश करने की प्रक्रिया है। योग और तंत्र में ‘कुण्डलिनी शक्ति’ का विशेष महत्व बताया गया है। यह शक्ति प्रत्येक मनुष्य के भीतर सुप्त अवस्था में विद्यमान होती है। जब साधक मंत्र, ध्यान और अनुशासन के माध्यम से इस शक्ति को जागृत करता है, तो उसके जीवन में अद्भुत परिवर्तन होते हैं।
‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ 

यह नवार्ण मंत्र आद्याशक्ति जगदम्बा के मूल स्वरूप अर्थात् शक्ति के मूल से जुड़ने का मंत्र है। शक्ति जागरण का नवार्ण मंत्र जब श्रद्धा और अनुशासन के साथ जपा जाता है, तो यह साधक के भीतर स्थित ऊर्जा चक्र सक्रिय हो जाते है। कुण्डलिनी शक्ति तंत्र का वह खण्ड है जिसकी व्याख्या बहुत विराट् है। तंत्र के इस विराट् खण्ड में प्रवेश श्रद्धा और अनुशासन के साथ सद्‌गुरुदेव के सान्निध्य में साधना के माध्यम से ही संभव है।

तंत्र और दैनिक जीवन: अदृश्य विज्ञान
भारतीय संस्कृति की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि उसने गूढ़ से गूढ़ ज्ञान को भी अत्यंत सरल परम्पराओं के माध्यम से जनसामान्य के जीवन में समाहित कर दिया है। हमारे दैनिक जीवन में अनेक ऐसी क्रियाएं हैं, जो वास्तव में तांत्रिक व्यवस्था का ही एक रूप हैं, परन्तु उन्हें हमारे जीवन में परम्परा स्वरूप में पिरोया गया है जिससे किसी भी प्रकार का भय व्याप्त नहीं हो। प्रातःकाल उठकर सूर्य को अर्घ्य देना, घर में दीपक जलाना, तुलसी की पूजा करना, भोजन से पूर्व प्रार्थना करना, जन्म, मृत्यु, विवाह इत्यादि के समय की जाने वाली ऐसी कई क्रियाएं है जो तंत्र के सूक्ष्म प्रयोग है जिन्हें परम्परा के सांचे में डाल कर हमारे जीवन में पिरोया गया है।
ये सभी क्रियाएं केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऊर्जा संतुलन की वैज्ञानिक प्रक्रियाएं हैं। सूर्य को जल अर्पित करना हमारे नेत्रों, मस्तिष्क और मानसिक ऊर्जा को संतुलित करता है; दीपक जलाने से वातावरण में सकारात्मक कंपन उत्पन्न होते हैं; तुलसी का पौधा वायुमंडल को शुद्ध करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ यह मन ही तंत्र का केन्द्र है। यदि मन संतुलित है, तो जीवन की प्रत्येक क्रिया संतुलित होगी और यदि मन असंतुलित है, तो कोई भी तंत्र कार्य नहीं करेगा।

ऋतु – पर्व और तांत्रिक व्यवस्था
प्रत्येक त्यौहार, व्रत, पर्व के पीछे गहरा तांत्रिक और वैज्ञानिक आधार छिपा हुआ है। नवरात्रि में उपवास और साधना का विधान केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि शरीर और मन की शुद्धि का एक तंत्र है। इस समय ऋतु परिवर्तन होता है और उपवास के माध्यम से शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त किया जाता है, जबकि साधना के माध्यम से मानसिक ऊर्जा को जागृत किया जाता है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का सेवन, श्रावण मास में सात्विक आहार, कार्तिक मास में दीप-दान ये सभी तांत्रिक व्यवस्थाएं हैं जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करती हैं।
शास्त्रों में कहा गया है – ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ स्वस्थ शरीर ही हमारे जीवन के कार्यों, कर्तव्यों का आधार है। तंत्र शरीर और मन को इस प्रकार व्यवस्थित करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सके।

परिवार और समाज: एक जीवंत तंत्र
भारतीय समाज की संरचना स्वयं में एक तांत्रिक व्यवस्था है। परिवार, समाज और संस्कृति ये सभी मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जो व्यक्ति को सुरक्षा, संतुलन और दिशा प्रदान करता है। घर में बड़ों का सम्मान करना, उनके आशीर्वाद को ग्रहण करना, शुभ कार्यों से पूर्व पूजा करना, ऋतु चक्र के अनुरूप आहार, पितृ पूजा, यज्ञ-हवन इत्यादि शक्ति को तीव्र करने की प्रक्रियाएं है। ये सामान्य परम्पराएं, व्रत-पर्व, मांगलिक कार्यक्रम इत्यादि तंत्र के सरलतम स्वरूप में शक्ति को सकारात्मकता प्रदान करने की क्रियाएं ही है।
तुलसीदास जी कहते हैं – बड़े भाग मानुष तन पावा। यह मानव जीवन स्वयं में एक तंत्र है, जिसमें प्रत्येक क्रिया का एक निश्चित परिणाम होता है। यदि यह तंत्र संतुलित है, तो जीवन सुखमय होता है और यदि यह असंतुलित है, तो दुःख और संघर्ष उत्पन्न होते हैं।
(साभार: निखिल मंत्र विज्ञान)

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