सामाजिक सुधार की बजाय प्रशासनिक विफलता का जानलेवा कारण बन गई नीति
डी. के. वत्स
पटना : वर्ष 2016 में जब बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, तब इसके मूल में एक अत्यंत संवेदनशील, दूरगामी और जन-कल्याणकारी सामाजिक सोच निहित थी। इस ऐतिहासिक नीति का मुख्य उद्देश्य राज्य की महिलाओं को घरेलू हिंसा से मुक्ति दिलाना, निर्धन और वंचित परिवारों के आर्थिक बजट को बिगड़ने से बचाना तथा समाज में अपराध दर पर प्रभावी लगाम लगाना था। इसे सामाजिक क्रांति और महिला सशक्तिकरण का मास्टरस्ट्रोक बताकर बड़े जोर-शोर से लागू किया गया था।
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शुरूआती दौर में इसके सकारात्मक और उम्मीद जगाने वाले परिणाम भी देखने को मिले। अनगिनत परिवारों में शांति लौटी, महिलाओं का आत्मविश्वास मजबूत हुआ और उन्हें यह संबल मिला कि वे नशे में धुत होकर मारपीट करने वाले पुरुषों के खिलाफ खुलकर शिकायत दर्ज करा सकें। समाजशास्त्रियों और राज्य सरकार के अध्ययनों के अनुसार, शुरू में कई परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी तथा शराब पर बर्बाद होने वाला पैसा बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पौष्टिक भोजन पर खर्च होने लगा। किन्तु, एक दशक (10 वर्ष) का लंबा समय बीत जाने के बाद जब इस कानून के व्यावहारिक धरातल और जमीनी नतीजों का निष्पक्ष विश्लेषण किया जाता है, तो एक बेहद चिंताजनक, भयावह और दुखद तस्वीर उभरकर सामने आती है। जिस नीति को सामाजिक सुधार का जरिया बनना था, वह आज प्रशासनिक विफलता और तीखे सियासी घमासान का केंद्र बन चुकी है।
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आंकड़े स्वयं इस कानून के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक राज्य में 11 लाख से अधिक केस दर्ज हो चुके हैं, 18 लाख से अधिक गिरफ्तारियां हुई हैं और लगभग 15 लाख लोग जेल की सलाखों के पीछे जा चुके हैं। इस अवधि के दौरान 5.5 करोड़ लीटर से अधिक देसी-विदेशी शराब तथा 13 लाख लीटर से अधिक कच्ची या अवैध शराब जब्त की जा चुकी है। इसके बावजूद, हाल ही में राजधानी पटना, मुंगेर और कैमूर जैसे जिलों से रोजाना हजारों लीटर अवैध शराब की बरामदगी यह साबित करती है कि शराब की आपूर्ति शृंखला टूटने के बजाय और अधिक संगठित तथा नेटवर्कबद्ध हो चुकी है। इस नीति का सबसे बड़ा प्रशासनिक दुष्प्रभाव यह हुआ है कि पुलिस और गुप्तचर तंत्र की पूरी ताकत नागरिक सुरक्षा, विधि-व्यवस्था और संगीन अपराधों के नियंत्रण को छोड़कर केवल शराब पकड़ने, छापेमारी करने और गश्त लगाने में उलझकर रह गई है।
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हाल ही में नेशनल काउंसिल आॅफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की आई रिपोर्ट ने सरकार के उन तमाम दावों की हवा निकाल दी है, जिनमें शराबबंदी को पूरी तरह सफल बताया जाता रहा है। रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई है कि राज्य में पूर्ण पाबंदी को हटाकर सख्त नियंत्रण, लाइसेंसिंग व्यवस्था और ‘गुजरात मॉडल’ जैसे व्यावहारिक विकल्पों पर पुनर्विचार किया जाए। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक गलियारों में जुबानी तीर चलने शुरू हो गए हैं, जिससे सत्तारूढ़ एनडीए के भीतर का विरोधाभास भी सतह पर आ गया है।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बार-बार मोर्चा खोलते हुए कहा है कि जमीन पर शराबबंदी का व्यावहारिक असर नहीं दिख रहा है। उनका कहना है कि कानून के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां हैं, जहां बड़े माफिया बेखौफ घूम रहे हैं और गरीबों को एक-एक लीटर के लिए जेलों में ठूंसा जा रहा है। इसलिए गुजरात मॉडल की तर्ज पर इस कानून की तत्काल समीक्षा होनी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के कई नेता समय-समय पर व्यावहारिक ढील या पुनर्विचार का समर्थन करते रहे हैं, हालांकि राजस्व मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि क्या केवल राजस्व कमाने के लिए कोठा खोल दिया जाए?
दूसरी तरफ, जनता दल (यूनाइटेड) और उत्पाद एवं मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने कानून में किसी भी तरह के संशोधन या ढील से साफ इंकार कर दिया है। जदयू नेताओं का मानना है कि गुजरात मॉडल पर सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है और नीतीश कुमार द्वारा लागू की गई यह नीति पूरी कड़ाई के साथ जारी रहेगी। असल में, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू को डर है कि शराबबंदी में जरा सी भी ढील देने से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक मान-सम्मान और छवि पर आंच आएगी। हालांकि, हकीकत यह भी है कि कभी राज्य के गांव-गांव में राजस्व वृद्धि के लिए शराब दुकानें खुलवाने वाले नीतीश कुमार ने बाद में वोट बैंक की राजनीति के तहत यह फैसला लागू किया था। इधर, पूर्व नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का सीधा आरोप है कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों और भ्रष्ट तंत्र की सरपरस्ती में राज्य में हजारों करोड़ रुपये की एक समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था धड़ल्ले से फल-फूल रही है।
इस नीति का सबसे दर्दनाक और संवेदनशील पहलू यह है कि नशा-नियंत्रण का दावा करने वाला यह कानून अवैध तथा जहरीली शराब के खूनी कारोबार का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। जिन लोगों की जानें पहले सामान्य शराब के सेवन से नहीं जाती थीं, उससे कहीं अधिक लोग अब जहरीली और रसायनों से बनी नकली शराब पीकर असमय काल के गाल में समा रहे हैं। सारण (छपरा), सिवान, मोतिहारी और अन्य जिलों में समय-समय पर हुए भीषण जहरीली शराब कांडों ने दर्जनों निर्दोष परिवारों को पूरी तरह उजाड़ दिया है। सबसे दुखद स्थिति यह है कि अवैध शराब के इस व्यापक तंत्र में बड़े तस्कर, गिरोह के सरगना और पुलिस-प्रशासनिक गठजोड़ अक्सर साफ बच निकलते हैं, जबकि जेलों में बंद अधिकांश लोग राज्य के गरीब, मजदूर, मुसहर और सीमांत वर्ग से आते हैं, जो केवल नाममात्र के सेवन या छोटी-मोटी ढुलाई के आरोप में पकड़े गए हैं।
इसके अतिरिक्त, आर्थिक मोर्चे पर भी यह नीति राज्य के लिए दोहरी मार साबित हो रही है। शराबबंदी के कारण जहां एक तरफ बिहार सरकार को हर साल 14 से 15 प्रतिशत के भारी-भरकम राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है (जो सालाना हजारों करोड़ रुपये बैठता है), वहीं दूसरी तरफ वही पैसा काली कमाई के रूप में शराब माफियाओं, तस्करों और भ्रष्ट नौकरशाही की जेबों में जाकर समानांतर अवैध अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है।
किसी भी लोक-नीति का अंतिम मूल्यांकन उसकी केवल मूल भावना से नहीं, बल्कि उसके जमीनी परिणामों और जन-जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव से होता है। अब समय आ गया है कि सरकार अपने जिद्दी रवैये को छोड़कर कड़वी जमीनी हकीकत को स्वीकार करे और इस नीति के समग्र दूरगामी प्रभावों पर ठंडे दिमाग से आत्ममंथन करे। यदि इस कानून को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, तो कम से कम गुजरात मॉडल की तर्ज पर व्यावहारिक बदलाव, पास प्रणाली या नियंत्रित लाइसेंसिंग जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
जब तक गैर-कानूनी धंधे, पुलिसिया भ्रष्टाचार और जहरीली शराब के अवैध निर्माण पर पूर्ण विराम नहीं लगता, तब तक यह कानून केवल एक कागजी ढकोसला और समाज के कमजोर वर्गों का उत्पीड़न करने का जरिया ही बना रहेगा। सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी स्थायी सामाजिक सुधार केवल कठोर दंडात्मक कानूनों और पुलिसिया डंडे के बल पर हासिल नहीं किया जा सकता; इसके लिए प्रशासनिक पारदर्शिता, दृढ़ इच्छाशक्ति, व्यावहारिक नीतियों और व्यापक जन-जागरूकता के बीच संतुलन होना अनिवार्य है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
