- डी. के. वत्स –
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की तपती भट्ठी में जिस अमर उद्घोष ने करोड़ों भारतीयों के भीतर राष्ट्रचेतना की लौ प्रज्वलित की थी, वह ‘वंदे मातरम्’ आज एक बार फिर देश की मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में है। विडंबना यह है कि जिस राष्ट्रीय गीत ने औपनिवेशिक हुकूमत की चूलें हिलाते हुए पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया था, वही आज दलीय प्राथमिकताओं, वैचारिक खेमेबंदी और तीखी बयानबाजी की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। मुद्दा केवल छह पदों (अंतरों) और दो पदों के गायन तक सीमित नहीं है; असली सवाल यह है कि क्या राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को राजनीतिक नफे-नुकसान की कसौटी पर कसा जाना चाहिए?
इस राजनीतिक घमासान को नए सिरे से हवा तब मिली जब स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इस वीडियो को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने राष्ट्रगीत के गायन में बाधा डाली। दावा किया गया कि सोनिया गांधी गीत के दौरान बातचीत कर रही थीं और हाथ के इशारे से बाकी के पद गाने से रोकती हुई दिखाई दे रही थीं। भाजपा ने इसे राष्ट्रगीत और संवैधानिक मूल्यों का सीधा अनादर करार दिया। इसके जवाब में कांग्रेस ने सफाई दी कि सोनिया गांधी राष्ट्रगीत का विरोध नहीं कर रही थीं, बल्कि वह अस्वस्थता के बावजूद लंबे समय से खड़े पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी मंगवाने का इशारा कर रही थीं।
विवाद को और अधिक बल केंद्र सरकार के उस नए वैधानिक कदम से मिला, जिसके तहत राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और अगस्त 2026 के प्रथम सप्ताह में राष्ट्रपति की स्वीकृति के साथ लागू हो गया। इसके तहत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान ही वैधानिक सुरक्षा और सम्मान प्राप्त हुआ है। नए नियमों के अनुसार राष्ट्रगीत का अनादर करने या इसके गायन में जान-बूझकर बाधा डालने पर तीन साल तक की जेल और जुमार्ने का सख्त प्रावधान है।
गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि आधिकारिक समारोहों में राष्ट्रगान से ठीक पहले ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह पदों का पूर्ण गायन किया जाएगा, जिसकी कुल समयावधि 190 सेकंड (3 मिनट 10 सेकंड) निर्धारित की गई है। इस दौरान उपस्थित जनसमूह के लिए सावधान की मुद्रा में खड़ा होना अनिवार्य है। सरकार का तर्क है कि जब 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगान के समान दर्जा देने की घोषणा की थी, तो इसे वही कानूनी सुरक्षा मिलनी स्वाभाविक है।
इस कानूनी बदलाव के जवाब में भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव चरम पर पहुंच गया है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय टीम की बैठक में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंदों का पूर्ण गायन हुआ और इसमें कांग्रेस के खिलाफ 10 बिंदुओं का कड़ा निंदा प्रस्ताव पारित किया गया। भाजपा शीर्ष नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे तुष्टीकरण की राजनीति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का सीधा अपमान करार देते हुए देशव्यापी प्रदर्शन का एलान किया। भाजपा ने महात्मा गांधी के उस कथन को भी जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया, जिसमें उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ को साम्राज्यवाद-विरोधी और शुद्धतम राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत नारा बताया था।
दूसरी तरफ, कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) ने 19 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि पार्टी अपने आधिकारिक कार्यक्रमों में केवल शुरूआती दो पद ही गाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी नेतृत्व का कहना है कि वे अक्टूबर 1937 के उस ऐतिहासिक प्रस्ताव का पालन कर रहे हैं, जिसे महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रनिर्माताओं ने आपसी सहमति से स्वीकार किया था। कांग्रेस का ऐतिहासिक तर्क है कि शुरूआती दो पदों में मातृभूमि के वात्सल्य और प्राकृतिक सौंदर्य का सर्वसमावेशी वर्णन है। बाकी के पदों को कांग्रेस धर्म के चश्मे से देख रही है।
राष्ट्रगीत के पूर्ण स्वरूप को लेकर राज्यों में भी अलग-अलग रुख देखने को मिल रहा है। कर्नाटक और तेलंगाना में जहां ‘वंदे मातरम्’ का पूरा संस्करण गाया जा रहा है, वहीं केरल सरकार ने इसे अनिवार्य आदेश के बजाय केवल एक सलाह मानते हुए सभी छह पद गाना जरूरी नहीं माना है।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो 1911 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ (जिसकी गायन अवधि 52 सेकंड है) और 1870 के दशक में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखे गए ‘वंदे मातरम्’ ने स्वाधीनता आंदोलन को एक अभूतपूर्व नैतिक ऊर्जा दी थी। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार टैगोर द्वारा गाए जाने से लेकर 1906 में ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके सार्वजनिक उद्घोष पर बैन लगाने तक, इस गीत ने भारत माता की मुक्ति का अलख जगाया।
राजनीतिक विचारधाराओं और कार्यशैली में भिन्नता लोकतंत्र का सहज लक्षण है, किंतु जब विषय राष्ट्रीय स्वाभिमान का हो तो राजनीतिक संकीर्णताओं से परे हटने की आवश्यकता होती है। ‘वंदे मातरम्’ किसी एक पार्टी, धर्म या विचारधारा की बपौती नहीं, बल्कि भारत के सामूहिक त्याग और अमर बलिदान का पावन प्रतीक है। 3 मिनट 10 सेकंड के गायन और कानूनी बाध्यताओं पर अपनी-अपनी दलीलें हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्रगीत की गरिमा को दलीय नफे-नुकसान या चुनावी अखाड़े में घसीटना उस राष्ट्रीय चेतना पर आघात है, जिसे देश के वीर शहीदों ने अपने रक्त से सींचा था।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
