- शंभुनाथ आसी | (दरभंगा, बिहार)

विद्या धन उत्तम सतत
हरय हृदय केर अन्ध।
बिना गुरू केर कृपा सं
पसरय कोना सुगन्ध।
शिक्षा ज्ञानक स्रोत थिक
गुरु गोमुखी गंग।
शिव सिर केर भूषण बनय
गुरु शिष्यक सत्संग।।
बिना गुरुक नहि भ’ सकय
कखनहुं उत्तम ज्ञान।
एकलव्य सन बनि धरी
सदिखन गुरु केर ध्यान।।
गुरु हो सदि कर्तव्यनिष्ठ
पिता पुत्र सम नेह।
गुरुक हृदय बनिके रहय
सतत सुरक्षित गेह।।
चाही शिक्षक कें बनब
मलयागिरि केर काठ।
जेम्हरे सं ओ चलि पड़थि
होय सुवासित बाट।।
गुरु सर्वोपरि जगत मे
हुनि सन क्यो नहि आन।
गुरुक चरण रज माथ ध’
राभ भेलथि भगवान।।
कुम्हकारवत गुरु रहय
सतत दिव्यतम मूर्ति।
रहथि ध्यान द’ शिष्य पर
विद्या ज्ञानक पूर्ति।।
मार्ग प्रदर्शक बनि गुरू
देथि भविष्यक बाट।
तीर्थ सकल गुरु हृदय मे
परम मनोरम घाट।।
शिक्षा शब्दक अर्थ थिक
सीखब उत्तम ज्ञान।
सभा मध्य रहि हंस बनि
क्षीर सुधा रस पान।।
