भारतीय राजनीति जब सिद्धांतों के अकाल से गुजरने लगती है, तब सामाजिक विभाजन और धार्मिक ग्रंथों पर भ्रामक प्रहार ही कुछ नेताओं का अंतिम आश्रय बन जाते हैं। वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस के अधेड़ राजकुमार और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली इसका स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत कर रही है। सनातन परंपरा पर अनर्गल प्रहार करके और हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने का उनका यह प्रयास केवल वैचारिक दिवालियापन नहीं, बल्कि सत्ता की छटपटाहट में भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना पर सीधा हमला है।

हाल ही में उत्तराखंड में एक कार्यक्रम के पश्चात मंच के शुद्धिकरण को लेकर जिस प्रकार निराधार आरोप लगाए गए, वह इस बात का परिचायक है कि बिना ठोस प्रमाणों के जनता में असंतोष की भावना भड़काना ही अब मुख्य राजनीतिक एजेंडा बन चुका है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस घटना से स्वयं को पूरी तरह अलग करने के बावजूद, आरएसएस और पूरे हिन्दू संगठन को कटघरे में खड़ा करने की हड़बड़ी यह दर्शाती है कि उद्देश्य न्याय की तलाश नहीं, बल्कि समाज में दरार पैदा करना है। सामाजिक ध्रुवीकरण का यह खेल अब मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को बिना समझे, केवल राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग करने तक पहुंच चुका है।
यह विडंबना ही है कि जो नेता आज मनुस्मृति के नाम पर समाज में आक्रोश भड़काने का प्रयास कर रहे हैं, उन्होंने शायद स्वयं इसके ऐतिहासिक संदर्भों का अध्ययन नहीं किया है। यदि वे अपने ही दल के पूर्वजों के विचारों को पढ़ लेते, तो शायद ऐसी गलतफहमी का शिकार न होते। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि ‘मनु जैसी महान आत्माओं के विचारों को सम्मानपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए।’ नेहरू ने यह भी रेखांकित किया था कि ‘हजारों वर्ष पूर्व का सामाजिक परिवेश आज से सर्वथा भिन्न था और काल के साथ व्यवस्थाएं बदलती हैं।’ यही बात महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया था कि ‘किसी भी प्राचीन संहिता से उसके श्रेष्ठ विचारों को सहेजा जाना चाहिए।’ सनातन धर्म की कोई एक अंतिम ‘रूल बुक’ नहीं है, यह किसी एक ग्रंथ से बंधा हुआ मत नहीं है।
भारत का एकमात्र सर्वोच्च विधान हमारा संविधान है। आज न तो कोई मनुस्मृति को लागू करने की मांग कर रहा है और न ही देश का सिविल या क्रिमिनल लॉ इसके आधार पर चलता है। फिर भी इसे बार-बार विवादों के केंद्र में लाने का आखिर वास्तविक मकसद क्या है? दरअसल, यह दोहरा रवैया केवल एक खास वर्ग को लक्षित करने और सनातन परंपरा को कटघरे में खड़ा करने के लिए अपनाया जाता है। अन्य धर्म-संप्रदायों की कुरीतियों या कट्टरपंथी कानूनों पर चुप्पी साध लेना और केवल सनातन धर्म की आलोचना करके स्वयं को ‘धर्मनिरपेक्ष’ साबित करना अब एक घिसा-पिटा फॉर्मूला बन चुका है। इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजों और वामपंथी विचारकों ने सनातन ग्रंथों में जमकर मिलावट की और मूल संदर्भों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया।
मनुस्मृति में जहां स्त्री संरक्षण, राजा और अधिकारियों के लिए कड़े दंड तथा सामाजिक दायित्वों के कई नियम दिए गए हैं, उन्हें पूरी तरह से अनदेखा कर दिया जाता है। जिस ग्रंथ में पद पर बैठे व्यक्ति के अपराध करने पर सामान्य नागरिक से हजार गुना अधिक दंड का सुझाव दिया गया हो, उसे केवल एक वर्ग विशेष के शोषण का जरिया बताना ऐतिहासिक अज्ञानता को दर्शाता है। राजनीति का अंतिम उद्देश्य यदि केवल घृणा, प्रतिशोध और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करना बन जाए, तो देश की अखंडता के लिए गंभीर संकट पैदा हो जाता है। कभी कोट के ऊपर जनेऊ पहनकर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में शामिल होने वाले नेता जब अपनी सहूलियत के हिसाब से समाज के एक वर्ग को अपमानित करने लगें, तो जनता को उनकी मंशा समझने में देर नहीं लगती।
हिन्दुस्तान अपनी विविधता और समरसता के लिए जाना जाता है। सनातन धर्म ने युगों-युगों से सभी विचारों का समावेश किया है। राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक वैमनस्य का यह विषैला बीज बोने की कोशिश करने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत का जनमानस अब ऐसे भ्रामक अभियानों को पहचान चुका है। सनातन के सम्मान और सामाजिक एकता से खिलवाड़ करने वाली राजनीति को देश कभी स्वीकार नहीं करेगा।
