ईश्वर की कृपा और गुरु का मार्गदर्शन तभी सफल, जब स्वयं का पुरुषार्थ हो साथ : पद्म भूषण स्वामी तेजोमयानंद

Mithila Varnan

चिन्मय विद्यालय में ‘गीता ज्ञान-यज्ञ’ का भव्य शुभारंभ, प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल मिश्रा ने किया उद्घाटन

VARNAN DIGITAL DESK
BOKARO
: इस्पातनगरी बोकारो स्थित चिन्मय विद्यालय के प्रांगण में तीन दिवसीय ‘ज्ञान-गीता-पंचामृत गीता ज्ञान यज्ञ’ का भव्य शुभारंभ सोमवार को हो गया। कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन मुख्य अतिथि बोकारो जिला न्यायालय के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिल मिश्रा, जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश गरिमा मिश्रा, चिन्मय मिशन रांची के प्रमुख परिपूर्णानंद सरस्वती, चिन्मय मिशन गोवा के प्रमुख सुघोषानंद सरस्वती तथा चिन्मय मिशन बोकारो की आवासीय आचार्या स्वामिनी संयुक्तानंदा सरस्वती द्वारा संयुक्त रूप से वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच दीप प्रज्वलित कर किया गया।

समारोह के आरंभ में चिन्मय मिशन बोकारो के अध्यक्ष बिस्वरूप मुखोपाध्याय ने सभी अतिथियों का आत्मीय स्वागत किया। उन्होंने चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख व प्रसिद्ध वेदान्त विद्वान पद्म भूषण स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती जी के विराट व्यक्तित्व, कृतित्व और भारतीय संस्कृति व अध्यात्म के वैश्विक प्रचार-प्रसार में उनके अतुलनीय योगदान पर विस्तृत प्रकाश डाला।

ज्ञान यज्ञ के मुख्य वक्ता वेदांत मर्मज्ञ स्वामी तेजोमयानंद महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के पांचवें श्लोक की मर्मस्पर्शी व्याख्या करते हुए कहा कि ईश्वर की कृपा और गुरु का मार्गदर्शन साधक की सहायता जरूर करता है, परंतु पूर्ण सफलता और आत्मोत्थान के लिए स्वयं का पुरुषार्थ अनिवार्य है। उन्होंने जीवन का गूढ़ रहस्य समझाते हुए कहा कि मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और शत्रु भी; यदि वह मन को बुद्धि के नियंत्रण में रखकर श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को अपनाता है तो उसका उत्थान निश्चित है। पूज्य गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि भगवान श्री कृष्ण द्वारा प्रतिपादित 700 श्लोकों में से ‘गीता पंचामृत’ के ये पांच श्लोक मानव जीवन के संशय, दुविधा और अज्ञान को मिटाने में अमृत के समान काम करते हैं।

इससे पूर्व प्रातःकालीन सत्र में चिन्मय विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए पूज्य गुरुजी ने मुण्डकोपनिषद् का संदर्भ दिया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि शिक्षा देना अत्यंत पुनीत और पवित्र कार्य है। आधुनिक दौर में जब माता-पिता जीविकोपार्जन और धनार्जन में व्यस्त हैं, तब बच्चों को सुशिक्षित व संस्कारवान बनाने का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व शिक्षकों के कंधों पर है। उन्होंने सभी कर्मियों को स्वयं के दायित्वों और कर्मों को मूल्यवान समझते हुए आनंदपूर्वक शिक्षण कार्य करने की सीख दी।

इस आध्यात्मिक महोत्सव के अवसर पर चिन्मय मिशन बोकारो के उपाध्यक्ष महेश त्रिपाठी, सचिव हरिहर राउत, चिन्मय विद्यालय बोकारो के प्रभारी प्राचार्य नरमेंद्र कुमार एवं उप प्राचार्य डॉ. रोशन शर्मा सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और शहर के प्रबुद्ध श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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