चेतना का बहीखाता है कर्म, नीयत और आपका आंतरिक संतुलन

सद्गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली

मनुष्य की विकास यात्रा एक आध्यात्मिक तंत्र है, जिसे हमारे ऋषियों-मुनियों ने कर्म, पाप और पुण्य के सिद्धांतों से समझाया है। यह विकास यात्रा वर्तमान युग में और भी अधिक तीव्र हो गई है। प्रत्येक व्यक्ति विकास चाहता है, उन्नति चाहता है, समृद्धि चाहता है। व्यापार, नौकरी, उद्योग, श्रम हर कर्म के पीछे प्रगति की आकांक्षा है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि सृष्टि का स्वभाव ही विकास है। बीज वृक्ष बनना चाहता है, नदी समुद्र तक पहुंचना चाहती है, मनुष्य भी अपनी पूर्णता की ओर बढ़ना चाहता है।

पाप-पुण्य: चेतना की गुणवत्ता का विज्ञान
जीवन यात्रा में अनेक बार व्यक्ति जाने-अनजाने ऐसे कर्म कर बैठता है, जिससे किसी को दु:ख पहुंचता है, किसी का अहित होता है, किसी का अधिकार छिनता है। यहीं से पाप और पुण्य की चर्चा प्रारम्भ होती है। सामान्यत: लोग पाप को केवल हिंसा, छल, चोरी या अधर्म मानते हैं और पुण्य को दान, पूजा, व्रत या तीर्थ तक सीमित समझते हैं, परन्तु वास्तव में पाप-पुण्य सूक्ष्म आध्यात्मिक विषय हैं, आध्यात्मिक परिभाषा में पाप-पुण्य चेतना की गुणवत्ता का विज्ञान है।
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्...
अर्थात् परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।

कर्म की गति और नीयत का महत्व
कर्म जब किसी के जीवन में सुख, सहयोग, संरक्षण, प्रसन्नता और उन्नति का कारण बनते हैं, वहां पुण्य है। कर्म जब किसी के दु:ख, अपमान, शोषण या विनाश का कारण बनते हैं, वहां पाप है। किन्तु जीवन इतना सरल भी नहीं कि हर कर्म को स्पष्ट रूप से पाप या पुण्य की श्रेणी में रख दिया जाए। जीवन में कई कर्म ऐसे होते हैं, जिन्हें बाह्य स्वरूप में पाप-पुण्य के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। जैसे चिकित्सक शरीर काटता है, पर जीवन बचाने के लिये, न्यायाधीश दंड देता है, पर व्यवस्था की रक्षा के लिये, महाभारत में अर्जुन का युद्ध धर्मस्थापना के लिये था। अत: पाप-पुण्य का निर्णय केवल कर्म से नहीं, भावना, उद्देश्य और धर्म बुद्धि से होता है।
‘गहना कर्मणो गति:’
अर्थात् कर्म की गति अत्यन्त गूढ़ है। मनुष्य अक्सर सोचता है कि यदि कर्म करते-करते किसी को हानि हो जाए तो क्या वह पाप है? संसार में रहते हुए पूर्णत: किसी को अप्रभावित रखकर कर्म करना लगभग असम्भव है। व्यापार में प्रतियोगिता होगी, निर्णय होंगे, संसाधनों का उपयोग होगा, कहीं न कहीं कोई तो प्रभावित होगा ही।

गीता का निष्काम संदेश और सूक्ष्म पाप
इसीलिए जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का उपदेश गीता के माध्यम से दिया है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थात् कर्म करो, पर आसक्ति और स्वार्थ के विष से मुक्त होकर। जब कर्म केवल लोभ, ईर्ष्या, छल, अहंकार और दूसरों को पछाड़ने की वृत्ति से होता है, तब वही कर्म पाप के संस्कार बनाता है और कर्म यदि लोकहित, कर्तव्यनिष्ठ और ईश्वरीय भाव युक्त हो तो पुण्य का रूप ले लेता है। पाप-पुण्य हमारे विचारों, भावनाओं और व्यवहार में उपस्थित रहता है। कटु वचन, ईर्ष्या, किसी को अपमानित करना, किसी की प्रगति से जलना ये भी पाप के सूक्ष्म रूप हैं। इसी प्रकार करुणा, क्षमा, सत्य, सहानुभूति, मधुरता, किसी को प्रोत्साहित करना, ये सभी पुण्य के जीवन्त रूप हैं। कई बार एक मुस्कान, एक सहारा, एक सांत्वना हजार यज्ञों से बड़ा पुण्य बन जाती है।

चित्त का आवरण और पुण्य का अहंकार
उपनिषद् में स्पष्ट आया है कि पाप कोई बाहरी दाग नहीं, यह चित्त पर पड़ा आवरण है। जैसे धूल दर्पण की चमक छिपा देती है, वैसे ही पाप आत्मप्रकाश को ढक देता है। पुण्य वह है, जो चेतना को निर्मल कर देता है। जब कर्म पूजा बन जाता है, तब वह पाप-पुण्य के स्थूल चक्र से ऊपर उठने लगता है। यही कर्मयोग है। पाप-पुण्य केवल पूर्वजन्म के साथ-साथ वर्तमान जीवन में भी फल देते हैं। पाप मन को अशांत करता है, भय देता है, अपराधबोध कराता है। पुण्य संतोष, निर्भयता और सौभाग्य लाता है। कई व्यक्ति बाह्य रूप से सफल दिखते हैं, पर भीतर अशांत होते हैं, ये पापजन्य संस्कारों के परिणाम हैं। दूसरी ओर कोई साधारण जीवन जीकर भी आनंदित और तेजस्वी है, यह पुण्यबल का प्रभाव है। पुण्य केवल अगले जन्म के लिये बैंक बैलेंस नहीं, यह जीवन की अदृश्य सुरक्षा भी है। अनेक बार संकट टल जाना, असम्भव में सहायता मिल जाना, अनपेक्षित कृपा बरसना, ये सब पुण्य के कारण ही होते हैं। एक और गहरी बात है, पुण्य भी बंधन बन सकता है, यदि उससे अहंकार उत्पन्न हो। ‘मैं बड़ा दानी हूं, मैं बड़ा धार्मिक हूं’, यह भाव पुण्य को भी क्षीण कर देता है। इसलिए उपनिषद् में कहा गया है कि पाप से बचो, पुण्य करो, फिर पुण्य के अहंकार से भी ऊपर उठो। यही निष्कामता है।

प्रायश्चित और स्वभाव का रूपांतरण
मनुष्य के जीवन में कुछ पाप जाने-अनजाने भी हो जाते हैं। इस हेतु हिन्दू धर्म में प्रायश्चित की व्यवस्था भी की गई है- जैसे जप, तप, दान, सेवा, प्रार्थना, क्षमा याचना। प्रायश्चित दंड नहीं, चेतना की शुद्धि है। जैसे स्नान शरीर को शुद्ध करता है, वैसे प्रायश्चित अंत:करण को शुद्ध करता है। तीर्थ स्नान, दान, अन्नदान, गुरु सेवा, गुरु दक्षिणा, वृक्षारोपण, जीव दया, ये सभी केवल पुण्य संचय नहीं, पापक्षालन के साधन भी हैं। सबसे बड़ा प्रायश्चित, स्वभाव परिवर्तन है। यदि भूल हुई और उससे सीख लेकर व्यक्ति धर्ममार्गी बन गया, तो वही पाप आगे चलकर जागरण का कारण बन सकता है।

आधुनिक जीवन और साधनों की पवित्रता
आज के युग में पाप-पुण्य की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि सफलता की दौड़ में साधनों की शुद्धता पीछे छूटती जा रही है। लोग परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं। जबकि सनातन धर्म में साध्य जितना महत्वपूर्ण है, साधन उतने ही पवित्र होने चाहिए। पाप से बचने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, सजग होकर जीना है। व्यापार करो पर छल मत करो। लाभ कमाओ पर शोषण मत करो। प्रतिस्पर्धा करो पर द्वेष मत रखो। निर्णय लो पर अन्याय मत करो। यही आधुनिक जीवन में धर्म है। यदि किसी के अहित की कामना नहीं, केवल धर्मसम्मत उन्नति की चाह है, तो कर्म पवित्र हो जाता है। अर्थात् उद्देश्य किसी का अहित नहीं करना है, यही धर्म का मूल है।

ब्रह्मांडीय संतुलन और साक्षी भाव
वास्तव में पाप-पुण्य कोई डराने की व्यवस्था नहीं, जीवन को संतुलित रखने का ब्रह्मांडीय नियम है। जैसे प्रकृति में क्रिया-प्रतिक्रिया है, वैसे ही नैतिक जगत में पाप-पुण्य का सिद्धांत है। यह हमें संवेदनशील बनाता है कि हमारी सफलता किसी के विनाश पर न टिके। एक उच्चतर अवस्था वह है, जहां साधक पाप-पुण्य दोनों से परे साक्षी भाव में स्थित हो जाता है। गीता इसे त्रिगुणातीत अवस्था कहती है। वहां कर्म होता है, पर कर्तापन नहीं। वहां सेवा होती है, पर अहंकार नहीं। वहां धर्म स्वभाव बन जाता है। तब पुण्य कमाने की चेष्टा भी नहीं रहती, व्यक्ति स्वयं पुण्य का स्रोत बन जाता है। सद्गुरुदेव ने तो स्पष्ट कहा है कि पाप-पुण्य बाहरी लेखा नहीं, जीवन की दिशा है। जो भीतर के अंधकार को बढ़ाए, वही पाप का स्वरूप है। इसी प्रकार जो विशुद्ध चेतना को प्रकाशित करे, वह पुण्य। जो बांधे वह पाप, जो मुक्त करे, वह पुण्य। जो दूसरों को पीड़ा दे वह पाप, जो जीवन में मंगल जगाए वह पुण्य।

(साभार : निखिल मंत्र विज्ञान)

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