कल्पना नहीं, जीवन्त सत्ता हैं ईश्वर

  • सद्गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली

बहुत पुरानी कथा है। जब सृष्टि का निर्माण हुआ, तब ईश्वर ने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना के रूप में मनुष्य को गढ़ा। मनुष्य में उन्होंने अपनी ही छवि डाल दी। वह सोच सकता था, सृजन कर सकता था और अपने विचारों से संसार को बदलने की क्षमता रखता था। जब देवदूत ने इस नई रचना को देखा तो वह चकित रह गया। उसे लगा कि यह तो ईश्वर का ही प्रतिरूप है, इसमें और प्रभु में कोई अंतर ही नहीं है। यदि ऐसा रहा तो यह मनुष्य कहीं अपने को सर्वशक्तिमान न मान बैठे। देवदूत ने प्रभु से कहा, प्रभु, यह रचना बहुत ही अद्भुत है, परन्तु इतना सामर्थ्य इसे मत दीजिए। आप फिर इस पर शासन कैसे करेंगे?

ईश्वर मुस्कुराए और बोले, मैं इसे अपना दास बनाना ही नहीं चाहता। यह मेरा सहयोगी होगा। मैं इसके साथ मिलकर इस जगत को सुंदर बनाऊंगा। मुझे शासन नहीं करना, मुझे इसका पालन करना है।

देवदूत यह सुनकर असमंजस में पड़ गया। वह तो केवल हरकारा था, ईश्वर का संदेशवाहक और यहां प्रभु मनुष्य को अपने बराबर का स्थान दे रहे थे। उसने कहा, मेरी एक बात मान लीजिए प्रभु। आप इस रचना के मन में निवास कीजिए, लेकिन इसे यह रहस्य मत बताइए कि आप उसके अन्दर रहते हैं। इतना प्रयास तो इसे स्वयं करना चाहिए। तभी यह सृष्टि सच्चे अर्थों में पूर्ण होगी।

ईश्वर को देवदूत की यह सलाह पसन्द आई। उन्होंने वैसा ही किया। तब से ईश्वर मनुष्य के भीतर है और मनुष्य उन्हें बाहर ढूंढता है। कभी मंदिरों में, कभी पहाड़ों पर, कभी तीर्थों में, कभी आकाश की ओर निहारता है। परन्तु, सत्य यह है कि परमात्मा हमारे भीतर ही विद्यमान है। कबीर ने इस रहस्य को अनुभव करके कहा –

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अंधियारा मिट गया, दीपक देख्या मांहि।।

कबीर का आशय था कि जब तक ‘मैं’ यानी अहंकार है, तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं होता। जब ‘मैं’ मिट जाता है, तब हरि प्रकट होते हैं।

मीरा ने भी यही अनुभव गुरु के माध्यम से पाया। उन्होंने गाया-
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो,
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।।

मीरा के लिए गुरु वह सेतु बने जिन्होंने उन्हें भगवान के निकट पहुंचा दिया। परन्तु, सामान्य मनुष्य न तो कबीर है न मीरा। फिर भी हमारे भीतर यह आकांक्षा गहरी है कि कभी तो परमात्मा का प्रत्यक्ष अनुभव करें। क्या सामान्य मनुष्य के लिए यह केवल दिवा स्वप्न है? नहीं। ईश्वर हमारी ही सबसे गहरी कामना है, जिनसे हम अलग हो गए हैं। इसी कारण हमें बेचैनी है, इसी कारण हमें खोज है।

यहीं पर कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा उपयुक्त है-
लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।

साधक जब प्रभु के प्रेम में रंग जाता है, तो उसे चारों ओर वही रंग दिखाई देता है। यहां तक कि वह स्वयं भी उसी रंग में रंग जाता है। यह दोहा बताता है कि ईश्वर का प्रेम इतना प्रबल है कि वह साधक को पूरी तरह अपने रंग में रंग देता है, लेकिन समस्या यह है कि हम ईश्वर को बाहर खोजते हैं। जैसे आकाश में अनगिनत तरंगें व्याप्त रहती हैं और केवल सही आवृत्ति पर ट्यून करने से वे सुनाई देती हैं, वैसे ही ईश्वरीय चेतना हर जगह बह रही है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपने मन को उसी तरंग पर स्थिर करना सीखें।

प्रार्थना
प्रार्थना इस स्थिरता का साधन है। परन्तु, सच्ची प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, यह आत्मा की पुकार है, जहां मन एकाग्र हो, हृदय भावनाओं से भर जाए और अहम् पूर्णत: समर्पित हो। प्रार्थना एकतरफा निवेदन नहीं, यह संवाद है। हमें बोलना भी है और मौन होकर सुनना भी है। मौन श्रवण ही हमें प्रभु की वाणी तक ले जाता है।

ध्यान
ध्यान इस संवाद का सबसे प्रभावी द्वार है। जब श्वास नियन्त्रित होती है और चित्त मौन होता है, तब आत्मा भीतर की ओर यात्रा करती है। साधक को अनेक दिव्य संकेत मिलते हैं कभी गहन शांति की अनुभूति, कभी आंखें मूंदते ही प्रकाश का दर्शन, कभी अंतरिक्ष में गूंजता दिव्य नाद और कभी हृदय को भर देने वाली अवर्णनीय प्रेम की लहर। ये सब ईश्वर से संवाद के रूप हैं।

अनुशासन
सबसे आवश्यक इस मार्ग में अनुशासन ही है। साधक को प्रतिदिन निश्चित समय पर ध्यान करना चाहिए, घर में एक पवित्र स्थान साधना के लिए बनाना चाहिए, शुद्ध और सात्त्विक आहार ग्रहण करना चाहिए, सत्संग और सेवा को जीवन का अंग बनाना चाहिए। यही वे आधार हैं जिन पर ईश्वरीय संवाद की इमारत खड़ी होती है। फिर भी यह मार्ग सरल नहीं है। मन बार-बार चंचल होगा, संदेह उठेंगे और अहंकार साधक को गिराने का प्रयास करेगा। किन्तु, धैर्यपूर्वक मन को बार-बार एकाग्र करना, अनुभव आने तक साधना जारी रखना और अनुभव आने पर भी विनम्र बने रहना, यही सफलता की कुंजी है।

गुरु चेतना से शिष्य चेतना
इस पथ पर गुरु का स्थान अद्वितीय है। गुरु केवल विधियां नहीं बताते, वे अपनी चेतना से शिष्य की चेतना को स्पर्श करते हैं। वे पूर्ण को जो सीमित को असीम से जोड़ते हैं। मीरा इसका ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे गुरु के मिलन से आत्मा राम धन पा लेती है। आध्यात्मिकता का अभ्यास केवल ध्यान-कक्ष की दीवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन का प्रत्येक कार्य पूजा है। हर परिस्थिति को परीक्षा समझो और हर श्वास में ईश्वर का स्मरण करो। जब जीवन सेवा और समर्पण में ढल जाता है, तभी साधना पूर्ण होती है। नियमित अभ्यास का फल अद्भुत है। साधक को अंतत: शांति और मानसिक स्थिरता मिलती है। समस्याएँ सहज हल होने लगती हैं। तन-मन का स्वास्थ्य सुधरता है। सम्बन्धों में प्रेम और मधुरता बढ़ती है। जीवन का सच्चा उद्देश्य प्रकट होता है।

इसलिए स्मरण रहे, ईश्वर कोई कल्पना नहीं हैं। वे जीवन्त सत्ता हैं, अनुभव करने योग्य सत्य हैं। जो साधना, प्रार्थना और ध्यान को दृढ़ता से अपनाता है, वह देख लेता है कि परमात्मा बोलते हैं और आत्मा उनका उत्तर सुनती है, यही संवाद जीवन को अमृतमय बना देता है। उन्नति के पथ का मार्ग प्रशस्त कर देता है क्योंकि जब हम परमात्मा से तार जोड़ लेते हैं तो हम बिल्कुल उनकी तरह बन जाते हैं, महान और दयावान।

(साभार : निखिल मंत्र विज्ञान)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *