भारतीय संविधान और राष्ट्रीय अस्मिता को खुली चुनौती

Mithila Varnan

संपादकीय

भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब देश की एकता और स्वाभिमान पर हमला हुआ है, तब-तब राष्ट्र की चेतना जागृत हुई है और देश ने एकजुट होकर उसका पुरजोर जवाब दिया है। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत केवल शब्दों का समूह भर नहीं हैं, बल्कि ये करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान, अभेद्य संकल्प और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा के प्रतीक हैं। किन्तु दुर्भाग्यवश, आज सत्ता की छटपटाहट और वोट बैंक की लिप्सा ने देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल को इस कदर संवेदनहीन बना दिया है कि वह राष्ट्रीय प्रतीकों का अनादर करने से भी परहेज नहीं कर रहा। हाल ही में संसद में और लालकिले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण गायन का जो ऐतिहासिक और संवैधानिक फैसला लागू हुआ, उसने पूरे भारतवर्ष में एक नई ऊर्जा का संचार किया। लेकिन, इसके विपरीत, दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में जो दृश्य सामने आया, उसने प्रत्येक संवेदनशील नागरिक को व्यथित किया है।

राष्ट्रगान के सस्वर प्रवाह के दौरान कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का एक-दूसरे को इशारे कर उपेक्षा जताना और उसके तुरंत बाद कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में यह प्रस्ताव पारित करना कि उनके कार्यकर्ता केवल दो छंद ही गाएंगे, सीधे तौर पर देश के कानून और संविधान को दी गई चुनौती है। इतिहास की परतों को उलटकर देखें तो 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में रहमतुल्ला की अध्यक्षता में कांग्रेस ने स्वयं ‘वंदे मातरम’ का पूरा गीत गाया था। इसके बाद 1918 में सैयद हसन इमाम और 1927 में एम. ए. अंसारी के नेतृत्व वाले अधिवेशनों में भी पूरे राष्ट्रगीत का सस्वर गूंजना इस बात का प्रमाण था कि 41 वर्षों तक किसी भी नागरिक को इसमें कोई आपत्ति नहीं दिखी। परंतु 1937 में जब मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने इस पर आपत्ति जताई, तो तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने सत्ता की चाहत में जिन्ना की हठधर्मिता के आगे घुटने टेक दिए और गीत को दो छंदों तक समेट दिया। कट्टरपंथियों के सामने तत्कालीन नेतृत्व की इसी आत्मसमर्पण की नीति का दुष्परिणाम अंतत: देश के दर्दनाक विभाजन के रूप में सामने आया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आजादी मिलने के बाद भी कांग्रेस ने इस राष्ट्रीय स्वाभिमान और पूर्ण राष्ट्रगीत के गौरव को पुनर्स्थापित करने की कोई ईमानदार कोशिश क्यों नहीं की? दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने के बजाय तुष्टीकरण को ही सर्वोपरि रखा गया। आज जब एक लंबे अंतराल के बाद ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण गायन का गौरवशाली संवैधानिक निर्णय लिया गया है, तब भी कांग्रेस का यह शर्मनाक रवैया उसकी पुरानी मानसिकता को ही उजागर करता है। जिस ‘वंदे मातरम’ ने स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे पर हंसते-हंसते झूलने की प्रेरणा दी, उसे आज फिर से तुच्छ राजनीति की बलि चढ़ाया जा रहा है।

जब कांग्रेस नेतृत्व को यह अहसास हुआ कि राष्ट्रगीत के इस अपमान से जनता में भारी रोष व्याप्त है, तो लोगों का ध्यान भटकाने के लिए नए-नए सियासी पैंतरे अपनाए जाने लगे। संसद मार्ग थाने के बाहर सात घंटे तक धरना देने का नाटक रचा गया, ताकि अपने राष्ट्र-विरोधी रवैये पर पर्दा डाला जा सके। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत किसी एक दल, धर्म या वर्ग के नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की साझा धरोहर हैं। संविधान के प्रति निष्ठा की कसमें खाने वाले जब खुद राष्ट्रीय प्रतीकों की अवहेलना करते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की संप्रभुता को चुनौती देना है। देश की जनता अब जाग चुकी है और वह भली-भांति समझती है कि किसके लिए राष्ट्र सर्वोपरि है और किसके लिए केवल राजनीतिक सत्ता। तुष्टीकरण की इस संकीर्ण सोच का जवाब भारत की जनता अपने स्वाभिमान के साथ देगी, क्योंकि राष्ट्र से बढ़कर कोई राजनीति नहीं हो सकती।

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