जब लाचार हुई कार्यपालिका, तो एक्शन में आई न्यायपालिका! हाईकोर्ट के हंटर से टूटी BSL की नाकेबंदी; इतवार को लगी विशेष अदालत

Mithila Varnan

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद ने किया तलब तो वर्चुअली हाजिर हुए बोकारो DC और SP, 18 घंटे से भीतर बंधक 3000 इस्पातकर्मी सुरक्षित बाहर निकले

VARNAN DIGITAL DESK
BOKARO :
जब सत्ता और सियासत के भारी दबाव तले जिले की कार्यपालिका और पुलिस तंत्र मूकदर्शक बन जाएं, राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा और हजारों जिंदगियां दांव पर लग जाएं, तब न्याय का अंतिम सहारा केवल न्यायपालिका ही बचती है। देश के सबसे बड़े फौलादी गौरव बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) में पिछले कई दिनों से चल रहे विस्थापित अप्रेंटिस आंदोलन के नाम पर जारी सियासत के क्रम में जब 11 प्रवेश द्वारों की मुकम्मल नाकेबंदी कर उत्पादन पूरी तरह ठप कर दिया गया, तब रविवार को झारखंड उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व हस्तक्षेप किया। दुर्गा पूजा अवकाश के दिन बैठी विशेष अदालत ने जैसे ही अपना न्यायिक हंटर चलाया, चंद घंटों के भीतर प्रशासन का पूरा तंत्र हरकत में आ गया। अदालत के सख्त आदेश के बाद सभी 11 गेटों से प्रदर्शनकारियों को खदेड़ कर स्थिति पूरी तरह सामान्य कर दी गई और इसके साथ ही एशिया के सबसे बड़े कारखाने के संचालन, औद्योगिक सुरक्षा तथा राष्ट्रहित की नई उम्मीदों के दरवाजे खुल गए।

दुर्गा पूजा अवकाश में बैठी स्पेशल कोर्ट

बोकारो स्टील लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखकर प्लांट पर मंडरा रहे महा-विनाश की आधिकारिक जानकारी दी थी। याचिका में सीधे तौर पर आरोप लगाया गया कि स्थानीय बोकारो विधायक श्वेता सिंह और विस्थापित अप्रेंटिस संघ के आंदोलनकारियों ने सभी 11 गेटों को पूरी तरह जाम कर दिया है, जिसके चलते कच्चे माल, कर्मचारियों और आवश्यक तकनीकी सेवाओं की आवाजाही ठप हो गई है। याचिका में खुलासा किया गया कि प्रबंधन द्वारा 15 अक्टूबर को ही चास प्रशासन और पुलिस को लिखित शिकायत दी गई थी, लेकिन सियासी दबाव और प्रशासनिक विफलता के चलते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे 17 अक्टूबर को ब्लास्ट फर्नेस, सिंटर प्लांट और स्टील मेल्टिंग शॉप (SMS-1 व 2) की भट्टियां खामोश हो गईं और रोज 30 करोड़ रुपये का नुकसान शुरू हो गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने पूजा की छुट्टियों के बावजूद रविवार को विशेष सुनवाई बुलाई। राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता जय प्रकाश वर्चुअल जुड़े, जबकि अदालत के सख्त रुख को भांपते हुए बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा और पुलिस अधीक्षक नाथू सिंह मीणा तत्काल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। अदालत ने उपायुक्त से सीधे जवाब तलब किया और कड़े शब्दों में पूछा कि क्या स्थिति को संभालने में स्थानीय प्रशासन असमर्थ है और क्या राज्य के गृह सचिव को तलब करने की जरूरत है। इस पर उपायुक्त ने हाथ जोड़कर अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी उच्चाधिकारी को बुलाने की दरकार नहीं है, वे स्वयं कानून का राज कायम करने में पूरी तरह सक्षम हैं।

अगर 7 दिन का वक्त न मिले तो ब्लास्ट फर्नेस में जम जाता 12,000 टन पिघला स्टील

बीएसएल की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने अदालत के सामने तकनीकी रूप से रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण पेश किया। उन्होंने बताया कि स्थापना काल (1964) से लेकर आज तक बोकारो स्टील प्लांट का उत्पादन कभी इस तरह जबरन बंद नहीं हुआ था। बोकारो स्टील एक अत्यंत संवेदनशील तापीय प्रतिष्ठान है। यदि नियमानुसार कम से कम सात दिनों की तकनीकी तैयारी के बिना प्लांट को अचानक रोका जाए, तो ब्लास्ट फर्नेस के भीतर लगभग 12,000 टन पिघला हुआ तरल स्टील (हॉट मेटल) जमकर पत्थर बन जाएगा। अगर ऐसा होता, तो हजारों करोड़ रुपये की मशीनें और फर्नेस हमेशा के लिए तबाह हो जातीं। साथ ही, संयंत्र के भीतर मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों की पाइपलाइनों का नेटवर्क फट सकता था, जिससे न केवल संयंत्र, बल्कि पूरे बोकारो शहर के लाखों नागरिकों के जीवन पर भोपाल जैसी गैस त्रासदी का साया मंडरा जाता। याचिका में यह भी याद दिलाया गया कि 13 अक्टूबर 1969 की बिहार गजट अधिसूचना और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट 1923 के तहत प्लांट के कई हिस्से अति-संवेदनशील व प्रतिबंधित क्षेत्र हैं, जहां इस तरह का उपद्रव पूर्णतः गैर-कानूनी है।

धारा 144 और धारा 163 का चला डंडा, 3000 बंधक कर्मी रिहा, आवाजाही बहाल

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बाद बोकारो जिला प्रशासन की सुस्ती मिनटों में फुर्र हो गई। अनुमंडल प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144) की शक्तियों का उपयोग करते हुए मुख्य द्वार सहित प्लांट के 200 मीटर के दायरे में निषेधाज्ञा का कड़ा पहरा बिठा दिया। भारी पुलिस बल ने प्रदर्शनकारियों को गेटों से पीछे धकेला और गेट संख्या-1 सहित सभी 10 अन्य द्वारों को पूरी तरह अवरोधमुक्त कराया।

इस त्वरित अदालती एक्शन का सबसे मानवीय पहलू यह रहा कि पिछले 18 से 24 घंटों से संयंत्र के भीतर बिना भोजन और पानी के फर्नेस व गैस पाइपलाइनों की पहरेदारी कर रहे करीब 3,000 इस्पातकर्मी और अधिकारी सुरक्षित बाहर निकल सके। जब थके-हारे कर्मी बाहर आए और अपने परिजनों से मिले, तो कई कर्मचारियों की आंखें नम हो गईं। अदालत में जब डीसी ने गेट-1 खोलने की सूचना दी, तो बीएसएल के अधिवक्ता ने सभी 11 गेटों को चालू करने की बात कही। इसके बाद डीसी ने पुष्टि की कि सभी 11 द्वारों से अधिकारियों और कर्मचारियों का आना-जाना पूरी तरह बहाल कर दिया गया है।

डीसी को शपथपत्र दाखिल करने का आदेश, 28 अक्टूबर को पहले मामले के रूप में सुनवाई

अदालत में जब बीएसएल के अधिवक्ता ने यह गंभीर आशंका जताई कि पुलिस के हटते ही आंदोलनकारी दोबारा गेटों को जाम कर सकते हैं, तो उपायुक्त अजय नाथ झा ने बार-बार हाई कोर्ट को आश्वस्त किया कि अब दोबारा ऐसी अराजकता नहीं होने दी जाएगी। उन्होंने कहा कि शिफ्ट के समय कर्मचारियों को भयमुक्त वातावरण और पूर्ण सुरक्षा दी जाएगी।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अदालत ने डीसी और एसपी को निर्देश दिया कि वे अपने बयानों और आश्वासनों को लेकर अदालत में विधिवत शपथपत्र (Affidavit) दाखिल करें। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर 2026 तय करते हुए इसे दिन के पहले मुकदमे के रूप में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया। हाई कोर्ट के इस कड़े हस्तक्षेप ने यह साबित कर दिया है कि जब राजनीतिक हस्तक्षेप से व्यवस्था पंगु होने लगती है, तब न्यायपालिका का संविधान सम्मत हस्तक्षेप ही उद्योग, आजीविका और आम नागरिक के जीवन की ढाल बनता है।

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