उग्रतम विस्थापित आंदोलन से हालात चरमराए, प्रबंधन ने चेताया- एक बार बंद हुईं यूनिट्स तो दोबारा चालू करना नामुमकिन जैसा
VARNAN DIGITAL DESK
BOKARO : देश के सबसे विशालकाय और फौलादी रीढ़ माने जाने वाले बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) के अस्तित्व पर अब तक का सबसे भयावह और अभूतपूर्व संकट मंडरा गया है। 10 अक्टूबर से प्रशासनिक भवन के सामने धरने पर बैठे विस्थापितों के आंदोलन ने अचानक ऐसा उग्र और विनाशकारी मोड़ ले लिया है कि उसने एशिया के इस विशाल स्टील प्लांट की धड़कनों को लगभग रोक दिया है। मुख्य द्वार को छोड़कर संयंत्र के तमाम प्रवेश द्वारों की पूर्ण नाकाबंदी कर दिए जाने के बाद प्लांट के भीतर आवश्यक कच्चे माल, रसायनों और तकनीकी सामग्रियों की आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ गई है। सुबह की पहली किरण के साथ जब सैकड़ों निष्ठावान कर्मचारी और अधिकारी संयंत्र को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए काम पर निकले, तो द्वारों पर खड़े आक्रोशित जत्थों ने उन्हें बैरंग लौटा दिया। जो चंद कर्मी किसी तरह जान जोखिम में डालकर मेन गेट के जरिए अंदर पहुंचे, उनके चेहरे पर दहशत साफ देखी जा सकती थी।
थम गए ट्रकों के पहिए, डिस्पैच लगभग शून्य
ट्रकों के पहिए थम चुके हैं, कच्चा माल लाने वाले भारी वाहन गेट के बाहर मीलों लंबी कतारों में बेजान खड़े हैं और तैयार फौलाद का डिस्पैच शून्य हो चुका है। आवश्यक रसायनों और तकनीकी कलपुर्जों की आमद बंद होने से अंदर की सांस फूल रही है। बाहर केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के हथियारबंद जवानों की सघन तैनाती ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। हालात इतने विस्फोटक और चिंताजनक हो चुके हैं कि संयंत्र का सतत संचालन असंभव होने की कगार पर पहुंच गया है और प्रबंधन को प्लांट शटडाउन (उत्पादन में भारी कटौती और इकाइयां बंद करने) जैसा आत्मघाती कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, 20 हजार करोड़ रुपए की लागत से शुरू हो चुकी विस्तारीकरण परियोजना एक बार फिर खटाई में पड़ने का खतरा गहरा गया है।
पिछले साल का जख्म अब भी गहरा, स्वर्णिम भविष्य पर गहराए काले बादल, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
पिछले वर्ष अप्रैल 2025 में प्रशासनिक भवन के समक्ष हुई हिंसक घटनाओं और तोड़फोड़ का जख्म अभी पूरी तरह भरा भी नहीं था। उस दौर में केंद्रीय इस्पात मंत्रालय ने तंग आकर इस 20 हजार करोड़ की विस्तार परियोजना को सेल की किसी अन्य सुरक्षित इकाई में स्थानांतरित करने का पूरा मन बना लिया था। बोकारो इस्पात संयंत्र की लगभग 20,000 करोड़ रुपए की प्रस्तावित ब्राउनफील्ड विस्तारीकरण परियोजना के भविष्य पर एक बार फिर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। पिछले वर्ष 3 एवं 4 अप्रैल को उत्पन्न अशांति एवं असामान्य परिस्थितियों के कारण इस महत्वाकांक्षी परियोजना को स्थगित करना पड़ा था। विभिन्न प्रयासों और चुनौतियों के बाद परिस्थितियों को सामान्य बनाने तथा परियोजना को पुनः गति प्रदान करने की दिशा में पहल की गई। हालांकि, वर्तमान घटनाक्रम ने एक बार फिर परियोजना की निरंतर प्रगति और भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेषज्ञों की मानें, तो पिछले वर्ष के घटनाक्रम से मिले अनुभवों के बावजूद यदि एक बार फिर वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, तो यह औद्योगिक विकास की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। औद्योगिक गतिविधियों में व्यवधान का प्रभाव केवल संयंत्र परिसर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे जुड़े व्यापक आर्थिक तंत्र पर भी पड़ता है।
बार-बार उत्पन्न होने वाली ऐसी बाधाएं न केवल परियोजना की समयसीमा और क्रियान्वयन की गति को प्रभावित कर सकती हैं, बल्कि भविष्य में निवेश संबंधी निर्णयों के समक्ष भी अनिश्चितता उत्पन्न कर सकती हैं। लगभग 20,000 करोड़ रुपए की यह प्रस्तावित परियोजना दीर्घकालिक औद्योगिक विकास से जुड़ी है, इसलिए इसके क्रियान्वयन के लिए स्थिर एवं अनुकूल वातावरण का होना अत्यंत आवश्यक है। यदि यह प्रस्तावित ब्राउनफील्ड विस्तारीकरण परियोजना समय पर पूरी होती, तो रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर सृजित होते, स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलता और विस्थापित परिवारों सहित पूरे क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि को नई दिशा मिलती। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने इन सभी संभावनाओं को एक बार फिर खटाई में डाल दिया है। ऐसे में पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए वर्तमान परिस्थितियों का गंभीरता से आकलन करना और औद्योगिक गतिविधियों को निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना आवश्यक है।
फर्नेस एक बार बुझी तो दोबारा शुरू करना होगा बेहद कठिन और खर्चीला
प्रबंधन द्वारा जारी बेहद सनसनीखेज और गंभीर चेतावनी ने पूरे औद्योगिक जगत में हड़कंप मचा दिया है। आधिकारिक तौर पर आगाह किया गया है कि बोकारो इस्पात संयंत्र एक अत्यंत उच्च ताप-संवेदी (थर्मल-सेंसिटिव) औद्योगिक प्रतिष्ठान है। इसका सीधा और खौफनाक मतलब यह है कि इसके ब्लास्ट फर्नेस, कोक ओवन और रोलिंग मिलों को निरंतर कच्चा माल और संचालन की आवश्यकता होती है। यदि कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण सुरक्षा कारणों से उत्पादन घटाया गया और महत्वपूर्ण उपकरण इकाइयों व सुविधाओं को आपातकालीन शटडाउन में डाला गया, तो उन्हें दोबारा पुनर्जीवित करना कोई बच्चों का खेल नहीं होगा। यदि आपूर्ति ठप होने के चलते आपातकालीन परिस्थितियों में इन भट्टियों का तापमान गिरा और वे ठंडी पड़ गईं, तो उन्हें दोबारा प्रज्वलित करना नामुमकिन जैसा होगा। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यदि यह संवेदनशील धमनियां एक बार जाम हुईं, तो उन्हें फिर से शुरू करने में महीनों नहीं, वर्षों लग जाएंगे। हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि संयंत्र अपनी पुरानी लय पकड़ पाएगा। भट्टियों का बुझना केवल मशीनों का बंद होना नहीं होगा, बल्कि वह सीधे तौर पर झारखंड के राजस्व और राष्ट्र की फौलादी बुनियाद की अपूरणीय आर्थिक हत्या होगी।
दांव पर लाखों जिंदगियां: ठेका मजदूर, ट्रांसपोर्टर और छोटे दुकानदारों के सामने भुखमरी का साया
यह गतिरोध केवल स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया या बोकारो स्टील प्लांट की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे बोकारो शहर और आसपास के जनजीवन पर एक आर्थिक सुनामी की तरह टूटने वाला है। बीएसएल प्रबंधन ने भावुक और कड़े लहजे में चेताया है कि यह संयंत्र केवल नियमित कर्मचारियों का ही पेट नहीं भरता, बल्कि ठेका श्रमिकों, ट्रांसपोर्टरों, स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं, छोटे व्यापारियों, फुटपाथ दुकानदारों और विभिन्न सेवा प्रदाताओं के लाखों परिवारों की दैनिक रोटी-रोजी की एकमात्र रीढ़ है। यदि संयंत्र की चिमनियों से धुआं निकलना बंद हुआ, तो पूरे क्षेत्र का सामान्य जनजीवन ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा और बाजार में भयानक भुखमरी व सन्नाटा पसर जाएगा।
प्रबंधन की दो-टूक – सीपीएसई की भर्तियां संविधान और नियमों से बंधी हैं
प्रबंधन ने विस्थापितों के आंदोलन पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह विस्थापितों की भावनाओं का पूरा आदर करता है और अनशन पर बैठे लोगों के गिरते स्वास्थ्य को लेकर बेहद संवेदनशील व चिंतित है। इसी कारण प्रबंधन उनसे लगातार भूख हड़ताल समाप्त करने की गुहार लगा रहा है। साथ ही प्रबंधन ने संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए दो-टूक याद दिलाया है कि भारत सरकार के अधीन संचालित किसी भी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (CPSE) में नियमित भर्तियां केवल और केवल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों, पारदर्शी नीतियों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही की जा सकती हैं; नियमों को ताक पर रखकर कोई मनमाना फैसला नहीं लिया जा सकता।
आत्मघाती गतिरोध खत्म करने की अपील
प्रबंधन ने अंतिम चेतावनी भरे लेकिन संवेदनशील अंदाज में बोकारो के सभी प्रबुद्ध नागरिकों, स्थानीय जनमानस और विस्थापित समूहों से भावुकता के साथ अपील की है कि वे इस आत्मघाती गतिरोध को तत्काल समाप्त करें। संयंत्र की नाकाबंदी हटाकर राष्ट्रीय संपत्ति, लाखों लोगों के भविष्य और शहर के अस्तित्व को बचाने के लिए आगे आएं और केवल आपसी शांतिपूर्ण संवाद के जरिए ही समाधान का रास्ता खोजें।
1500 अप्रेंटिस की सीधी बहाली सहित स्पष्ट नियोजन नीति पर अड़े आंदोलनकारी
आंदोलनकारी अपनी तीन सूत्री बुनियादी मांगों पर पूरी मजबूती से डटे हुए हैं। उनकी सबसे प्रमुख मांग है कि अप्रेंटिसशिप पूरी कर चुके सभी 1,500 विस्थापित अप्रेंटिस प्रशिक्षुओं की संयंत्र में अविलंब नियमित बहाली की जाए। इसके साथ ही, विस्थापितों ने मांग रखी है कि पहले की भांति चतुर्थ वर्ग के पदों पर स्थानीय विस्थापितों के लिए पुरानी आरक्षण व्यवस्था को पूर्ण रूप से बहाल किया जाए और संयंत्र के कारण अपनी उपजाऊ पुश्तैनी जमीन गंवाने वाले परिवारों के भविष्य के लिए एक ठोस व स्पष्ट नियोजन नीति बनाई जाए। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे पिछले डेढ़ साल से केवल आश्वासनों के सहारे जी रहे हैं और अब उन्हें संविदा या ठेकेदारी की आड़ में शोषण स्वीकार नहीं है। उनका साफ कहना है कि जब तक प्रबंधन सीधी नौकरी पर आधिकारिक मुहर नहीं लगाता, तब तक नाकाबंदी और तेज होगी।
आंदोलन को मिली सियासी ताकत… विधायक श्वेता सिंह के नेतृत्व में डटे हैं विस्थापित
इस पूरे आंदोलन को अब भारी राजनीतिक ताकत भी मिल चुकी है। बोकारो की कांग्रेस विधायक श्वेता सिंह के नेतृत्व में प्रशासनिक भवन के समीप टू-टैंक गार्डन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल लगातार सातवें दिन भी जारी रही। विधायक श्वेता सिंह की अगुवाई में चल रहे इस धरने को झारखंड कांग्रेस संगठन, प्रदेश प्रभारी के. राजू और कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव का भी खुला समर्थन मिल चुका है, जिससे यह लड़ाई अब स्थानीय सीमा से निकलकर दिल्ली और रांची के सियासी गलियारों तक गूंज रही है। अनशन स्थल पर आंदोलनकारियों का हौसला बढ़ाते हुए विधायक ने दो-टूक कहा है कि जब तक माटी के लालों को उनका हक और सम्मान नहीं मिलता, यह जनांदोलन एक कदम भी पीछे नहीं हटेगा। बहरहाल, दुर्गापूजा के त्योहारों की खुशियों के इस माहौल में विस्थापित आंदोलन और प्रबंधन की कथित अनदेखी के कारण स्थिति तनावपूर्ण हो गई है। शुक्रवार को मेन गेट सहित सभी गेटों के पास भारी संख्या में सीआईएसएफ जवानों की तैनाती से रणक्षेत्र सी परिस्थिति बन पड़ी है।
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