रोज 30 करोड़ का नुकसान, भूखे-प्यारे भीतर फंसे कर्मचारी, प्रबंधन ने प्रशासन से मांगी तत्काल मदद
VARNAN DIGITAL DESK
BOKARO : देश के औद्योगिक इतिहास में आज का दिन सबसे बड़े और अभूतपूर्व संकट के काले अक्षरों में दर्ज हो गया है। एशिया के सबसे विशालकाय और देश के गौरव कहे जाने वाले बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) के पहिए पूरी तरह थम चुके हैं। नियोजन की मांग को लेकर उग्र हुए विस्थापित समूहों के आंदोलन के चलते संयंत्र के तमाम प्रवेश द्वारों की मुकम्मल नाकेबंदी कर दी गई है। गेटों पर लाठी-डंडे और धरने के कारण सुबह और दोपहर की पाली में ड्यूटी पर पहुंचे कर्मचारियों, इंजीनियरों और श्रमिकों को संयंत्र के भीतर घुसने से रोक दिया गया। इसका सीधा और विनाशकारी असर यह हुआ कि स्वतंत्र भारत के इस फौलादी कारखाने में शनिवार को उत्पादन कार्य पूरी तरह ठप पड़ गया। हालात अब केवल धरना-प्रदर्शन और आवागमन में रुकावट तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि यह स्थिति पूरे शहर, संवेदनशील इकाइयों और औद्योगिक सुरक्षा के लिए एक भयानक टाइम बम में तब्दील होती दिख रही है।
शनिवार को जारी आधिकारिक उत्पादन रिपोर्ट के अनुसार, स्टील उत्पादन की जान कहे जाने वाले ब्लास्ट फर्नेस, सिंटर प्लांट और स्टील मेल्टिंग शॉप (SMS-1 एवं SMS-2) सहित तमाम प्रमुख रोलिंग मिलों और उत्पादन इकाइयों की मशीनें पूरी तरह खामोश हो चुकी हैं। फर्नेस में आग की लपटें धीमी पड़ने और लिक्विड स्टील का प्रवाह रुकने से संयंत्र को प्रतिदिन लगभग 30 करोड़ रुपए की सीधी वित्तीय क्षति होने का अनुमान लगाया गया है। उत्पादन ठप होने से राष्ट्रीय स्तर पर इस्पात आपूर्ति का चक्र भी बुरी तरह टूट गया है।
छह दशकों के सफर में विकास में रही है केंद्रीय भूमिका
उल्लेखनीय है कि बोकारो स्टील प्लांट अपने छह दशकों के सफर में औद्योगिक प्रगति के साथ साथ स्थानीय समुदाय एवं परिक्षेत्र के विकास में सक्रिय योगदान करता रहा है, लेकिन एक बार फिर यह संकट में दिख रहा है। त्योहारों के इस माहौल में शहर की खुशियां आंदोलन और अशांति की आग में खाक होती नजर आ रही है। अराजकता वाले इस माहौल में विधि व्यवस्था का भी संकट नज़र आने लगा है।
सेल (SAIL) एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (CPSE) होने के नाते सदैव समाज के साथ खड़ा रहा है तथा निर्धारित नियमों एवं अनुमन्य व्यवस्थाओं के अंतर्गत हरसंभव सहयोग एवं सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रबंधन ने आज जैसी गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति में प्रशासन से आवश्यक सहयोग एवं हस्तक्षेप का अनुरोध किया है, क्योंकि ऐसी परिस्थितियाँ संयंत्र की सुरक्षा, सुचारु संचालन एवं भविष्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती हैं।
जहरीली गैस पाइपलाइनों और लिक्विड स्टील पर मंडराया खतरा, ‘थर्मल-सेंसिटिव’ है प्लांट
बोकारो इस्पात संयंत्र केवल लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील तापीय एवं खतरनाक औद्योगिक प्रतिष्ठान है। यहां हजारों डिग्री के उच्च तापमान, खौलते हुए लिक्विड स्टील और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जानलेवा औद्योगिक गैसों का सुरक्षित संचालन हर सेकेंड की तकनीकी निगरानी पर निर्भर करता है। संयंत्र के भीतर विशाल गैस पाइपलाइनों का एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल नेटवर्क फैला हुआ है, जिसकी चौबीसों घंटे तकनीकी मॉनिटरिंग और सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य होता है।
खतरे में सुरक्षा, गैस रिसाव जैसी हो सकती है घटना
प्रमुख उत्पादन इकाइयों के अचानक बंद होने और सामान्य संचालन ठप पड़ जाने से इन संवेदनशील गैस प्रणालियों के दबाव को नियंत्रित रखना और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराना हर गुजरते मिनट के साथ चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। हालांकि, राहत की बात यह है कि अब तक संयंत्र में किसी गैस रिसाव या अप्रिय दुर्घटना की सूचना नहीं है, लेकिन लंबे समय से जारी नाकेबंदी के बीच किसी भी अप्रत्याशित तकनीकी खराबी या गैस रिसाव के गंभीर खतरे को कतई नकारा नहीं जा सकता। यदि गतिरोध यूं ही जारी रहा, तो सुरक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है।
18 घंटे से भीतर बंधक बने हैं इस्पातकर्मी, भूख-प्यास से बेहाल फिर भी निभा रहे फर्ज
इस औद्योगिक संकट का सबसे मार्मिक और दिल दहलाने वाला पहलू संयंत्र के भीतर फंसे कर्मचारियों की दास्तान है। गेटों पर अचानक लगे ताले के कारण कल से ड्यूटी कर रहे सैकड़ों इस्पातकर्मी पिछले 18 घंटे से अधिक समय से प्लांट परिसर के भीतर ही फंसे हुए हैं। बाहर से किसी के भी आने-जाने पर रोक होने के कारण इन कर्मचारियों को भोजन और पीने के पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए भी तरसना पड़ रहा है। शारीरिक थकान, लगातार ड्यूटी के भारी दबाव और भूख-प्यास के बावजूद ये कर्मवीर अपनी जान जोखिम में डालकर फर्नेस और गैस पाइपलाइनों की पहरेदारी में डटे हुए हैं, ताकि प्लांट में कोई बड़ा विस्फोट या गैस त्रासदी न हो सके। बाहर खड़े परिजन अपनों की सलामती को लेकर रोते-बिलखते नजर आ रहे हैं, जबकि भीतर फंसे कर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सुरक्षा मानकों की रक्षा कर रहे हैं। एंबुलेंस में जब खाने-पीने का सामान प्लांट ले जाया जा रहा था, तो आंदोलनकारियों ने उसे भी जाने से रोक दिया।
प्रबंधन की EMERGENCY APPEAL – आज रात ही खुलवाएं गेट, वरना होगा महा-विनाश
विस्फोटक होते हालात और राष्ट्रीय धरोहर पर मंडराते संकट को देखते हुए बोकारो इस्पात संयंत्र एवं सेल (SAIL) के शीर्ष प्रबंधन ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की आपात गुहार लगाई है। प्रबंधन ने राजकीय प्रशासन से हाथ जोड़कर अपील की है कि इस राष्ट्रीय प्रतिष्ठान और लाखों लोगों की आजीविका को बचाने के लिए आज रात्रि में ही विशेष पुलिस बल तैनात कर संयंत्र के सभी प्रवेश द्वारों को सुचारु रूप से खुलवाया जाए, ताकि राहत सामग्री, भोजन और नई पाली के तकनीकी कर्मचारी भीतर पहुंच सकें और संयंत्र को किसी बड़ी अनहोनी से बचाया जा सके।
कांग्रेसी विधायक के बाद राज्य के मंत्री राधाकृष्ण भी आए आगे, कहा- बेवकूफ न बनाए प्रबंधन

बीएसएल के खिलाफ इस विस्थापित आंदोलन को राजनीतिक शह उस वक्त और बढ़ गई जब कांग्रेसी विधायक श्वेता सिंह के बाद राज्य सरकार के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर भी सामने आ गए। शनिवार को बोकारो इस्पात संयंत्र के विस्थापितों के आंदोलन को लेकर शनिवार को प्रशासनिक व सेल प्रबंधन के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ता विफल हो गई। इससे पूर्व उपायुक्त अजय नाथ झा ने आठ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठीं बेरमो विधायक श्वेता सिंह से बातचीत की थी। इसके बाद झारखंड सरकार के मंत्री राधाकृष्ण किशोर की मौजूदगी में हुई त्रिपक्षीय वार्ता बेनतीजा साबित हुई। वार्ता विफल होते ही मंत्री सीधे टू टैंक गार्डन पहुंचे और धरने पर बैठ गए। धरने को संबोधित करते हुए मंत्री ने प्रबंधन पर कड़ा प्रहार किया और कहा कि अधिकारी समाधान निकालने के बजाय इतिहास का पाठ न पढ़ाएं। उन्होंने कहा कि झारखंड की जमीन पर बने प्लांट के लिए 32 हजार एकड़ जमीन ली गई, जिससे 23 हजार परिवार विस्थापित हुए, पर दशकों बाद भी करीब 10 हजार परिवारों को नियोजन नहीं मिला। उन्होंने अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षित युवाओं को अविलंब नौकरी देने, 1992 की नीति की आड़ में चतुर्थ वर्ग की बहाली रोकने का खेल बंद करने और स्व. प्रेम महतो मामले में दोषी अधिकारियों की तीन दिनों के भीतर गिरफ्तारी की मांग की। मंत्री ने ऐलान किया कि विस्थापितों की यह लड़ाई अब प्लांट के गेटों पर निर्णायक रूप से लड़ी जाएगी। बता दें कि शुक्रवार रात डुमरी विधायक जयराम महतो ने भी आंदोलन स्थल पहुंचकर अपना समर्थन दिया था। पिछले साल के आंदोलन में जयराम और श्वेता का इसी विस्थापित आंदोलन के दौरान विस्थापितों के साथ ‘सहानुभूति-युद्ध’ को लेकर खूब घमासान भी हुआ था।
बोकारो स्टील की रक्षा में बचाने को आगे आया अधिकारी संघ, बोले महासचिव पांडेय- शीघ्र खत्म हो गतिरोध

बोकारो स्टील प्लांट के सभी गेट बंद किए जाने तथा प्लांट के अंदर अधिकारियों एवं कर्मचारियों के फँसे होने की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए स्टील एक्जीक्यूटिव फेडरेशन ऑफ इंडिया (सेफी) के उपाध्यक्ष एवं बोकारो स्टील ऑफिसर्स एसोसिएशन (बीएसओए) के महासचिव अजय कुमार पांडेय ने सभी संबंधित पक्षों से इस गतिरोध को शीघ्र समाप्त करने की अपील की है। श्री पांडेय ने कहा कि बोकारो स्टील प्लांट देश की एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संपत्ति है। इसका सुचारु संचालन न केवल देश की औद्योगिक प्रगति, बल्कि झारखंड राज्य की अर्थव्यवस्था और बोकारो के समग्र विकास के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्लांट से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूसरे राज्यों से आकर यहां काम करने वाले कर्मचारी, ठेका श्रमिक, ठेकेदार, दुकानदार एवं अन्य व्यवसायी भी इससे लाभान्वित होते हैं।
उन्होंने कहा कि प्लांट के सभी गेट बंद होने से अधिकारियों एवं कर्मचारियों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। ऐसी परिस्थिति में किसी की तबीयत खराब होने या अन्य आपातकालीन स्थिति उत्पन्न होने पर गंभीर कठिनाइयाँ पैदा हो सकती हैं। इसलिए आपातकालीन सेवाओं और लोगों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि समस्याओं के समाधान के प्रयास में प्लांट का संचालन बाधित न हो और हजारों अन्य परिवारों की आजीविका पर संकट उत्पन्न न हो। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी माँगों को रखना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन प्लांट के सभी गेट बंद कर देना और उसके संचालन को प्रभावित करना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। धरना-प्रदर्शन के साथ-साथ आपसी संवाद, सहयोग और सकारात्मक पहल के माध्यम से समाधान का रास्ता निकालना आवश्यक है। बोकारो स्टील प्लांट का हित, बोकारो की प्रगति, झारखंड का विकास और हजारों परिवारों की आजीविका एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अतः ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे सभी पक्षों के हित सुरक्षित रहें, प्लांट का सामान्य संचालन बहाल हो और देश एवं राज्य की प्रगति निरंतर जारी रहे।
संयंत्र शटडाउन की कगार पर, संवाद से निकले हल: बीएकेएस

बोकारो इस्पात संयंत्र में जारी विस्थापित आंदोलन और प्रमुख द्वारों की नाकेबंदी को देखते हुए बोकारो अनाधिशासी कर्मचारी संघ (बीएकेएस) ने इस्पात मंत्री, इस्पात सचिव, झारखंड के मुख्यमंत्री, सेल चेयरमैन तथा निदेशक प्रभारी को पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। यूनियन के महासचिव हरिओम कुमार ने चेतावनी दी कि यदि नाकेबंदी के कारण धमन भट्टी और कोक ओवन जैसे विभाग बंद हुए, तो संयंत्र को दोबारा शुरू करने में महीनों लग जाएंगे, जिससे रक्षा आपूर्ति और राष्ट्रीय परियोजनाएं प्रभावित होंगी। यूनियन ने मांग की है कि उच्चाधिकारी औपचारिकता छोड़कर स्वयं आगे आएं और नियोजन व विस्थापन के स्थायी समाधान के लिए सभी पक्षों से सीधा संवाद करें। इसके साथ ही, बीएकेएस ने सेल के मानव संसाधन विभाग (एचआर) की कार्यप्रणाली और अनावश्यक मुकदमों पर हुए करोड़ों के खर्च की स्वतंत्र जांच कराने, कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा रास्ते बंद होने से ड्यूटी न पहुंच पाने वाले कर्मचारियों की दैनिक उपस्थिति दर्ज करने की मांग की है।
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